शुद्धाद्वैत के संस्थापक हैं श्री वल्लभाचार्य जो वैश्वानर (अग्नि) के अवतार हैं। उनके अनुसार शुद्ध का अर्थ है - माया के सम्बंध से रहित। इस प्रकार माया सम्बन्धरहित नितान्त शुद्ध ब्रह्म को जगत् का कारण माना जाता है “ब्रह्मसत्यम् जगत्सत्यम् अंशिजीवोहि नापर: “ अर्थार्थ - ब्रह्म सत्य है , जगत् सत्य है ,जीव ब्रह्म का अंश है ।
श्रीकृष्ण को ही ब्रह्म का स्वरूप मानना और उनके प्रति समर्पण ही पुष्टिमार्ग है ।पुष्टिमार्ग का प्राथमिक उद्देश्य मुक्ति नहीं है, बल्कि भगवान कृष्ण के प्रेम और आनंद का अनुभव करना और बिना किसी द्वंद्व के अपने भीतर कृष्ण के स्वरूप का एहसास करना है।
द्वैत दर्शन:
द्वैत दर्शन के संस्थापक हैं - श्री माधवाचार्य जो वायु के अवतार हैं । जीवात्मा और परमात्मा दोनों अलग-अलग हैं और ये अंतर मुक्ति के बाद भी रहेंगे। ईश्वर( ब्रह्म) को स्वतंत्र कहा जाता है और जीव और जगत दोनों अलग हैं और ब्रह्म पर निर्भर करते हैं इसलिए उन दोनों को परतंत्र कहा जाता है। इनके अनुसार पाँच भेद हैं उन्हें पंचभेद कहते हैं -
(१) जीव और ईश्वर में
(२) जीव और जीव में
(३) जीव और जड़ में
(४) ईश्वर और जड़ में
(५) जड़ और जड़ में ।
मोक्ष भगवान के प्रति शुद्ध भक्ति से प्राप्त कर सकते हैं।