भगवद् गीता प्रश्नोत्तरी- 140
☘️🌷जय श्री राम !! जय श्री कृष्ण !!🌷☘️
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वेदांत एक आध्यात्मिक दर्शन है जो तीन तत्वों और उनके बीच संबंध पर विचार करता है:  ब्रह्म, जीव और जगत।  पिछले प्रश्नोत्तरी में हमने अद्वैत और विशिष्टाद्वैत के बारे में देखा।  
आज हम शुद्धाद्वैत और द्वैत के बारे में देखेंगे।
शुद्धाद्वैत दर्शन
शुद्धाद्वैत के संस्थापक हैं श्री वल्लभाचार्य जो वैश्वानर (अग्नि) के अवतार हैं। उनके अनुसार शुद्ध का अर्थ है - माया के सम्बंध से रहित। इस प्रकार माया सम्बन्धरहित नितान्त शुद्ध ब्रह्म को जगत् का कारण माना जाता है 
  “ब्रह्मसत्यम् जगत्सत्यम् अंशिजीवोहि नापर: “ अर्थार्थ - ब्रह्म सत्य है , जगत् सत्य है ,जीव ब्रह्म का अंश है । 

श्रीकृष्ण को ही ब्रह्म का स्वरूप मानना और उनके प्रति समर्पण ही पुष्टिमार्ग है ।पुष्टिमार्ग का प्राथमिक उद्देश्य मुक्ति नहीं है, बल्कि भगवान कृष्ण के प्रेम और आनंद का अनुभव करना और बिना किसी द्वंद्व के अपने भीतर कृष्ण के स्वरूप का एहसास करना है।    

द्वैत दर्शन
द्वैत दर्शन के संस्थापक हैं - श्री माधवाचार्य जो वायु के अवतार हैं । जीवात्मा और परमात्मा दोनों अलग-अलग हैं और ये अंतर मुक्ति के बाद भी रहेंगे। ईश्वर( ब्रह्म) को स्वतंत्र कहा जाता है और जीव और जगत दोनों अलग हैं और ब्रह्म पर निर्भर करते हैं इसलिए उन दोनों को परतंत्र कहा जाता है।  इनके अनुसार पाँच भेद हैं उन्हें पंचभेद कहते हैं - 
 (१) जीव और ईश्वर में 
(२) जीव और जीव में
 (३) जीव और जड़ में 
(४) ईश्वर और जड़ में
 (५) जड़ और जड़ में ।
 मोक्ष भगवान के प्रति शुद्ध भक्ति से प्राप्त कर सकते हैं।
आपका नाम *
1.गीता के श्लोक १०.२० के अनुसार भगवान कहते हैं 
 “मैं संपूर्ण भूतों का ___________हूँ।”
*
2 points
2. घटोत्कच के माता पिता कौन है ? *
2 points
 3. विभूति योग के अनुसार, भगवान कहते हैं - “जलीय जीवों में मैं _______ हूँ। “ *
2 points
4. चार प्रकार के भक्तों में  से कौन श्रेष्ठ भक्त हैं? *
2 points
5. विश्वरूप दर्शन योग अध्याय ११ में भगवान कहते हैं “ हे अर्जुन! मैं जिस रूप में तुम्हारे समक्ष खड़ा हूँ उसे केवल ________ से जाना जा सकता है।” *
2 points
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