सड़कें नहीं आसमान में

लेकिन रास्ते अनेक हैं

कोई किसी से नहीं मिल रहा

लेकिन वास्ते अनेक हैं

कैसे रहें इन जगहों में

जहाँ अहसासों को समेटे

भीड़ में सब गुम हैं अपने आप में

नहीं सिमट पाते हैं अपने ख्वाबों में

दिन नहीं सिकुड़ते उनके दुःख या गुस्से में

फिर एक एक कर के सब चले गए

यादों के परे

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आजकल डर उभरता रहता है

कभी दरवाज़े के पीछे से

कभी आसमान के नीचे

तैरता रहता है ठंडी हवाओं में

लगता है जैसे मन में समा गया है

ना कोई वजह ना कोई पहचाना स्रोत

है इस डर का

जो दिल को सहलाता रहता है

किसी प्रेमी क़ि तरह

और डरता हो अनचाहे बिछोह से

किसी एक तारे के खोने का

या खुद बेवक्त बेलगाम रोने  का

आजकल डर रहता है साथ मेरे

जैसे मैंने ही उसे बुलाया हो

अपने साए क़ि जगह लेने के लिए

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खयालों के पास से गुज़र गया एक बादल

बिना किसी परछाईं को साथ लिए

जैसे जा रहा हो आशाओं और आकाँक्षाओं के परे

ज़िंदगी तो यूँ ही गुज़र जाती बिना किसी के

पर मिल जाए अगर सहारा

तो शायद वक्त भी बीत जाए न कोई हिसाब किये

अकेले तो कोई नहीं जीना चाहता

लेकिन कहाँ मिलते हैं साथी बिना पूरा किराया लिए

कब तक ठहरी रहेगी किस्मत मुह को सीए हुए

करती मजबूर अपने मुरीदों को सोचने पर

जियें तो कैसे जियें

कहाँ गया वह शहर जिसमे थे हमारे भी कुछ अध्पक्के वास्ते

अब बची है इक मुठी भर रेत से दिन और अनगिनत रास्ते

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कितनी बार यह सोचा

कि लौट चलूँ

पुनः पुराने रास्तों  पर

महसूस करना है एक बार फिर

कैसी हवा चल रही

हमारे छूटे हुए शहर में

किस तरह के संघर्ष पनप रहें हैं

या फिर सन्नाटा है

धूमिल यादों कि गलियों में

लोग छोड़ आयें है अपने वादे

भूल गए है सारे सीने में रखे इरादे

डूब गएँ हैं अपनी जिंदगियों के खोमचों में

बेचते आत्मसम्मान, ज़मीन

अपने अपने छुटपुट जहान

कोई भी बिकाऊ सामान

बदले में पाते चंद सिक्के, मुड़े तुड़े नोट

जो काम आते हैं दिन में तीन वक्त

और रात को सोने या जगाने के लिए

उनके बीच के क्षणों में समाये हुए युग

हो जाते हैं नज़रंदाज़

खो जाते हैं उनमे न केवल सपने

पर कुछ अपने

अब कोई अभियान नहीं है

घर पर

कोई नहीं है अवसर वापसी का

सिर्फ एक सफर

और स्वयं ही सरकते, गुजरते रास्ते

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