Published using Google Docs
Season 1 Episode 1.docx
Updated automatically every 5 minutes

जलवायु परिवर्तन का असर आपकी थाली पर | ft. अरविन्द शुक्ला


अतिथि : अरविन्द शुक्ला, संस्थापक न्यूज़ पोटली

होस्ट: सौरभ शर्मा
निर्माता: 101 रिपोर्टर्स, जमीनी स्तर के पत्रकारों का एक अखिल भारतीय नेटवर्क जो ग्रामीण भारत से मूल कहानियाँ तैयार करता है


[पॉडकास्ट परिचय]

हेलो दोस्तों 101 Reporters.com की तरफ से मैं सौरभ शर्मा आप सभी का स्वागत करता हूं | हमारे नए और पहले
अर्थ अनर्थ नेट पॉडकास्ट पर हम हर हफ्ते एक एक्सपर्ट को बुलाएंगे और उनसे बात करेंगे, उनसे जानेंगे जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर, हम जानेंगे कि जलवायु परिवर्तन कैसे हम आम जनमानस को हमारे किसानों को हमारे जानवरों को हमारी खेती किसानी को प्रभावित कर रहा है| मेरा नाम सौरभ शर्मा है और मैं 101 रिपोर्टर के साथ पिछले आठ सालों से नेटवर्क एडिटर के तौर पर जुड़ा हुआ हूं। मेरे लेख रॉयटर्स,टाइम्स यूके, अल जजीरा जर्नलिज्म रिव्यू जैसे संस्थानों पर पर पाए जा सकते हैं। ट्विटर पर मेरा पता @Saurabhsherry है।

आज इस एपिसोड में हम बात कर रहे हैं अरविंद शुक्ला से। अरविंद यूं तो पिछले एक दशक से जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर अलग-अलग हिस्सों से रिपोर्टिंग कर रहे हैं लेकिन हाल ही में उन्होंने अपना एक यूट्यूब चैनल न्यूज़पोटली के नाम से बनाया है। इस चैनल पर  अरविंद देश भर की तमाम जगहों पर  रिपोर्टिंग के लिए जाते हैं। जिसमें वे किसानों से जुड़ी जलवायु परिवर्तन के कारण से चल रही समस्या पर उनसे बात करते हैं। चलिए स्वागत करते हैं अरविंद का।

 नमस्कार मेरा नाम सौरभ है और आप सुन रहे हैं अर्थ अनर्थ । अर्थ यानि पृथ्वी जब इस पृथ्वी के चीजें अनुरूप ना हों तो होता है अनर्थ। हमारी पृथ्वी आज के समय में बहुत बड़ी समस्या से जूझ रही है, जिसे हम जलवायु परिवर्तन के नाम से जानते हैं। जलवायु परिवर्तन से जो लोग सबसे आगे की पंक्ति में लड़ रहे हैं वे हैं हमारे किसान। इसी सिलसिले में आज हम बात करेंगे अरविंद शुक्ला से।अरविंद शुक्ला यूँ  तो किसी परिचय के मोहताज नहीं है। लेकिन फिर भी मैं आपको बता दूं अरविंद शुक्ला पिछले एक दशक से किसानों की समस्याओं को लेकर रिपोर्टिंग करते रहे हैं। पिछले तीन सालों से उन्होंने अपना न्यूज़पोटली नाम का एक चैनल बना रखा है। जिस पर वे भारत के किसानों की हर प्रकार की समस्या को उठाने की कोशिश करते हैं। चलिए बात करते हैं अरविंद शुक्ला से।



[पॉडकास्ट साक्षात्कार]


सौरभ शर्मा: अरविंद जी हमारे पॉडकास्ट पर आने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!

अरविंद शुक्ला: शुक्रिया सौरभ जी इस अच्छे मुद्दे को उठाने के लिए।

सौरभ शर्मा: किसानों की भाषा में जलवायु परिवर्तन क्या है और इसकी परिभाषा क्या है? और इसे हम कैसे समझ सकते हैं कि यह एक समस्या है जिससे हम जूझ रहे हैं?

अरविंद शुक्ला: मेरे नजरिए से जलवायु परिवर्तन का जो पहला शिकार है वह किसान है। जलवायु परिवर्तन कुछ समय पहले ही आया जो अभी शहरों की परिधि में है। गांव के लोग इसके शिकार सबसे ज्यादा हैं लेकिन वह इसकी परिभाषा नहीं जानते हैं। वे समझते हैं की मौसम बदल गया है बारिश अब समय पर नहीं होती है। आषाढ़ में सूखा पड़ गया है, पूस में अब गर्मी होती है। हवा पानी से बदल गया है ऐसा महाराष्ट्र के लोग कहते हैं। पिछले एक दो वर्षों में COP का आयोजन हुआ जिससे लोग अब समझने लगे हैं। लेकिन ग्रामीणों की एक बड़ी आबादी है जिसको ये लगता है कि कुछ बदल गया है। वे जैसी खेती करते थे उसमें कुछ बदलाव आ गया है। किसानों को लगता है कि इस बदलाव से उनकी खेती प्रभावित हो रही है। किसानों को समझ में नहीं आ रहा है कि यह क्या हो रहा है।

सौरभ शर्मा: ये सार अभी समझ में आ रहा है कि किसानों को यह नहीं पता कि यह समस्या क्या है इसकी परिभाषा क्या है? मौसम के पैटर्न में बदलाव हो चुका है। जनवरी के मौसम में एक चलाना पड़ रहा है। ऐसे में किसानों पर क्या प्रभाव पड़ता है? आपका तो गांव से काफी लगाव है आप इसे कैसे देखते हैं? मुझे याद है कि पिछले के पिछले साल जनवरी के महीने में बारिश हो गई थी, तो किसानों सरसों की बुवाई की थी उसके बाद ओलावृष्टि हुई जिससे कि उनकी फसल पूरी तरह से बर्बाद हो गई थी। जनवरी के महीने में किस कौन सी फसल लगते हैं और क्या सरकार जलवायु जैसी समस्या से निपटने के लिए कोई कदम उठा रही है?

अरविंद शुक्ला: यह बहुत अच्छा प्रश्न है। अभी जनवरी का महीना चल रहा है, कुछ दिन पहले मैं झारखंड से आया हूं। वहां पर ना तो ज्यादा सर्दी होती है ना ही ज्यादा गर्मी होती है। जनवरी के महीने में वहां पर तापमान एकदम से बढ़ गया। मैं बोकारो गया था। मुझे अपने सर के ऊपर गमछा डालकर चलना पड़ रहा था। उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में हम होली तक स्वेटर पहना थे और फरवरी तक सर्दियां महसूस करते थे। झारखंड की जो आबो हवा है, वहां का तापमान अनुकूल रहता है। इस बार वहां पर तापमान अधिक होने के कारण मटर की फसल पर काफी प्रभाव पड़ा है। मैं आपको 2 साल पहले का एक हिस्सा बता रहा हूं नासिक जो की अंगूर का गढ़ माना जाता है। वहां पर फसल के टाइम पर रात का टेंपरेचर - 4 डिग्री के करीब आ गया जिससे कि अंगूर की फसल में क्रैकिंग आ गई थी। भारत की एक बड़ी आबादी का पेट गेहूं और धान की फसल से पलता है। गेहूं भारत की एक बड़ी फसल है। वर्तमान समय की बात करें तो कुछ जगहों पर चना मक्का लगा है। यह समय गेहूं की बालियों में दाना बनने का समय है। गेहूं में जब दाना बनना शुरू होता है तो वह दूध के रूप में होता है। अगर दान बनने के समय पर तापमान अनुकूल रहता है तो दान मोटा होगा और अच्छा होगा। किसान गेहूं की फसल बोने के लिए भी सर्दियों का इंतजार करता है, जब मौसम गेहूं की फसल के अनुकूल होता है तब किसान बुवाई करता है। पहले के समय बुवाई के समय पर मौसम अनुकूल नहीं होता था और अब बालियों में दाना दाना बनने पर मौसम अनुकूल नहीं होता इसका सीधा प्रभाव पैदावार पर पड़ता है। खेती नेचुरल फिनोमिना  है। अगर सर्दी ज्यादा आ गई पाला पड़ रहा है तो किसान फसल की सिंचाई कर देता है, तो ये फसल के अनुकूल हो जाता है। अगर गर्मी ज्यादा हो गई तो किस एक बार सिंचाई और कर देगा। अगर किसान थोड़ा टेक्निकल है तो खेत में फव्वारे लगा देगा। आज की समय में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि किसान को यह सारी चीज बताई नहीं जा रही हैं। किसानों को यह भी नहीं बताया जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन हो गया है ऐसे में आप क्या करेंगे इसे अपनी फसलों को कैसे बचाएंगे, किसान अभी भी भगवान के सहारे है।

सौरभ शर्मा: आप किसानों के बीच रहते हैं उनकी समस्याओं को सुनते हैं। आपने कहा कि भगवान किस के सहारे है। सरकार जमीन पर कुछ कर नहीं रही है। जो भी नियम बनाए जा रहे हैं वह फाइलों में अटके रहते हैं। जलवायु परिवर्तन के अनुकूल जो बीज विकसित किया जा रहे हैं वह कितने कारगर हैं और कितने किसानों तक पहुंच रहे हैं? क्या इसे किसानों को कोई मदद मिल रही है?

अरविंद शुक्ला: यह बहुत अच्छा और मौलिक प्रश्न है जो किसान इस पॉडकास्ट को सुन रहे होंगे उनके लिए भी बहुत जरूरी है। वायु अनुकूल बीज की दिशा में काम हुआ है। जिसमें सबसे ज्यादा फोकस गेहूं पर किया गया है। करनाल स्थित भारतीय गेहूं एवं जौं अनुसंधान संस्थान ने और पूसा ने जलवायु के अनुकूल गेहूं की कुछ अच्छी किस्म विकसित की है। अगर किसी वर्ष गर्मी अधिक पड़ गई तो उसमें भी यह बीच चल जाता है। किसानों को बीच पूसा और गेहूं जो अनुसंधान संस्थान हर साल देते हैं। गेहूं की नई किस्मों के बीज लेने पंजाब हरियाणा उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश और राजस्थान के किसान जाते हैं। उत्तर प्रदेश के बहुत कम किसान बीज लेने जाते हैं। बीजों में बहुत बड़ा घोटाला भी होता है क्योंकि बी पर कोई मोर नहीं होती है जबकि बोरी पर मुहर लगी होती है।


सौरभ शर्मा: अरविंद आप कई वर्षों से कृषि के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। मेरे मन में एक सवाल है जो मुझे पहले पूछना चाहिए था लेकिन वो मैं अब पूछ रहा हूं जलवायु परिवर्तन का पहला केस आपके संज्ञान में कब आया?

अरविन्द शुक्ला: ये बात साल 2018–19 की है महाराष्ट्र में बाढ़ आई थी। बाढ़ से किसानों का काफी नुकसान हुआ था। उसे वक्त में नांदेड़ में था। पास के ही एक गांव में गजानन शिंदे नाम के किसान ने सुसाइड किया था। दूसरे दिन में उसे मृत किसान के घर गया। वहां पर मैंने देखा कि मृत किसान की लगभग 26 वर्ष की पत्नी थी दो छोटे छोटे बच्चे थे। मैं उनके परिजनों से यह जानना चाहता था कि गजानन ने आत्महत्या क्यों की? जब थोड़ी जांच पड़ताल की तो पता चला कि किसान ने बारिश का इंतजार किया और जब बारिश नहीं हुई तो बी यूं ही बो दिए। बारिश न होने के कारण बीज नहीं उगे। महाराष्ट्र में आमतौर पर 25 जून के करीब मानसून आता है। दूसरा उसने कर्जा लिया बीज बोया फसल हरी भरी और अच्छी हुई लेकिन जब कटाई का टाइम आया तो ओलावृष्टि हुई, जिसके कारण उसकी फसल बर्बाद हो गई। किसान अगले दिन जब उठा उसने देखा कि उसकी फसल बर्बाद हो गई है तो उसने खेत में ही आत्महत्या कर ली। महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या का कारण यही है कि कभी बारिश न होने के कारण वह फसल की बुवाई नहीं कर पाते। किसान की आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण बारिश का लगातार काम होना व पानी की कमी है।

सौरभ शर्मा: हमारे आसपास का क्षेत्र बुंदेलखंड है। वहां पर प्राकृतिक स्रोतों का दोहन हुआ है जिससे हम काफी कुछ सीख सकते थे लेकिन हमने सीख नहीं ली। अरविंद जी मैं आपसे यह जानना चाहता था कि यह जो बारिश की अनियमित है और जो तापमान घट रहा है इससे हमारे किसान कितना प्रभावित हैं। तापमान का घटना बढ़ाना हमारे लिए कितनी बड़ी समस्या है। आपकी नजर यह से तापमान में उतार-चढ़ाव कब से हो रहा है? ये कितनी बड़ी समस्या है हमारे लिए?

अरविंद शुक्ला: खेती मौसम पर आधारित है प्रकृति पर आधारित है। 50% से अधिक किसान बारिश आधारित खेती करते हैं। वर्षा ऋतु के मौसम में जो बारिश होती है हमारा फसल चक्र इस पर चलता है। जलवायु परिवर्तन को मैंने पिछले 5–6 वर्षों से नोटिस करना शुरू किया है। जब मैं उम्र दराज किसानों से पूछता हूं कि दादा यह मौसम में बदलाव कब से हुआ है?  आपको क्या लगता है? तो उनका जवाब साफ होता है कि हमारे जवान में ऐसा कुछ भी नहीं होता था लेकिन अब पिछले 10–12 वर्षों से ऐसा हो रहा है। मुझे ऐसा लगता है कि यह पूरा चक्र दो दशकों का है। इस दशक में जलवायु परिवर्तन की तीव्रता काफी ज्यादा बढ़ गई है। बारिश है तो खेती है, बारिश है तो अन्न है, बारिश है तो पशुपालन है। अब बारिश तो होती है लेकिन उसका पैटर्न पूरी तरह बदल चुका है। अब बारिश को लेकर सबसे बड़ी यह समस्या है कि कम दिनों में अधिक बारिश होती है। दूसरा बारिश का लंबा गैप होना। इस तरह खेती का पूरा चक्र 360 डिग्री पर घूम गया है। आने वाले दिनों में जलवायु की समस्या और भी ज्यादा विकट हो सकती है।

सौरभ शर्मा: तापमान में वृद्धि वाला जो मेरा सवाल है उसपर आपने बोला कि कम दिनों में अधिक बारिश हो जाती है और खेती को आपने कहा कि कम कम पानी चाहिए। ड्राई स्पेल अधिक समय का हो गया है। मौसम के पैटर्न में बदलाव और बारिश का समय होना इससे क्या फसलों में कोई नई बीमारी या किसी प्रकार के नए कीट लग रहे हैं?

अरविंद शुक्ला: तो पहले तापमान पर आते हैं। यदि मौसम अनुकूल है तो एक दाने से 10 कल्ले निकलेंगे। उसे एक कल में बाली बनेगी दाने निकलेंगे। अगर फसल तापमान से प्रभावित हुई तो अंकुरण अच्छा नहीं होगा, कल्ले नहीं बनेंगे। कल्ले बन गए तो दाने नहीं बनेंगे। इस हिसाब से फसलों को काफी नुकसान होता है। अब हम बागवानी की बात करते हैं। कुल्लू में पहले अंग्रेज सेब  के बाग लगाया करते थे लेकिन अब वहां बाग नहीं बचे हैं। बाघ है लेकिन उसे हिसाब से पैदावार नहीं होती। ऐसी बहुत सारी फैसले हैं जिसमें की मौसम अनुकूल हुआ तो परांगण होगा फूल अच्छे आएंगे। अगर तापमान थोड़ा सा भी ज्यादा हुआ तो उसका असर पैदावार पर पड़ेगा। अब बात की कीटों करते हैं। हमने आपने रिपोर्टस में पढ़ा है कि यदि तापमान में एक प्रतिशत वैश्विक  तापमान की वृद्धि होती है तो फसलों में 46 प्रकार के कीट लगते हैं। किसानों का एक बड़ा खर्च फंगीसाइड या पेस्टिसाइड में जा रहा है। इससे किसानों की इनपुट कॉस्ट बढ़ रही है।

सौरभ शर्मा: आप बात कर रहे थे इनपुट कास्ट की तो इसे हम जलवायु परिवर्तन से जोड़कर देखें तो सबसे ज्यादा नुकसान किसको हो रहा है। जैसा कि अभी आपने बताया कि कम समय में ज्यादा बारिश होती है बारिश का अंतराल बढ़ गया है। नए-नए तरीके के की उत्पन्न हो रहे हैं इससे किसानों की इनपुट कॉस्ट बढ़ गई है। इसका सबसे अधिक प्रभाव प्रकार के किसानों पर पड़ा है? सीमांत किसान, बड़े किसान या फिर बटाई पर खेती करने वाले?

अरविंद शुक्ला: बटाई वाले इससे की एक अलग बात है। अभी सबकी बात करते हैं इससे हर किसान प्रभावित है। जैसे कि मैं उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले का रहने वाला हूं हम लोग के यहां तीन सिंचाई में गेहूं की फसल हो जाती है। वर्तमान समय में किसान गेहूं की फसल में 5 से 6 पानी लगा रहे हैं। अगर किसान का 1 बार की सिंचाई में 10 लीटर डीजल का उपयोग होता है तो इस हिसाब से एक बार की सिंचाई में उसे 900 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। दो बार की तो 1800 हो गया। सिंचाई करने के लिए दो मजदूर लगेंगे अगर मजदूरी 200रुपए ही मान लें तो एक बार का खर्च 400 हो जाता है। अगर फसल में कोई भी की या फंगस लग जाता है तो उसका खर्च अलग से बढ़ जाता है।इसका कोई गुणा भाग नहीं कर रहा है यह कहीं भी जोड़ा नहीं जा रहा है। पहले पहाड़ी इलाकों में किसान सब के बाग लगते थे उन्हें कुछ नहीं करना पड़ता था फसल आई तोड़ ली बाजार में भेज दिया। लेकिन अब क्या होता है की जलवायु परिवर्तन के चलते फसल के समय ओलावृष्टि हो जाती है जिससे की पूरी तरह फसल बर्बाद हो जाती है। इससे किसानों का काफी नुकसान हो जाता है। ओलावृष्टि से फसल को बचाने के लिए किस अब जाल लगवा रहे हैं जिसका की पर एकड़ खर्चा एक से डेढ़ लाख रुपए के करीब है। अभी कल मेरी एक किसान से बात हो रही थी उसकी अंगूर की फसल का सौदा व्यापारी से 10 लाख में हो चुका था। तीसरे दिन फसल तोड़ी जानी थी लेकिन दूसरे दिन ओलावृष्टि हो गई जिसके कारण पूरी फसल बर्बाद हो गई अब किस के खेत में 5000 रुपए का भी अंगूर नहीं बचा था। भविष्य के लिए उसे किस ने क्रॉप कर लगवाया जिसका की खर्चा 3,00,000 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से आया।

सौरभ शर्मा: अरविंद जी जब किसान की इनपुट कॉस्ट बढ़ गई है प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ गई है? तो ऐसे में किसान का प्रॉफिट कितना बढ़ा है?

अरविंद शुक्ला: किसान की आए दिन-ब-दिन कम होती जा रही है, प्रॉफिट काम होता जा रहा है। किसान की सालाना आय काम हो गई है। अगर कोई किसान अपनी पूरे साल की बैलेंस शीट बनाता होगा तो उसमें वह देखता होगा कि उसकी इनपुट कॉस्ट ज्यादा हो गई है जबकि उसकी प्रॉफिट कम हुआ है। पहले किस की इनपुट कॉस्ट कम लगती थी लेकिन अब इनपुट कॉस्ट ज्यादा लगती है प्रॉफिट काम होता है और जोखिम और अधिक बढ़ गया है।


सौरभ शर्मा: किसान का जोखिम बढ़ गया है ऐसे में किसानों के लिए फसल बीमा योजना कितनी कारगर है? क्या जलवायु परिवर्तन से हुए नुकसान को फसल बीमा योजना के तहत कोई राहत मिलती है?

अरविंद शुक्ला: किसानों का रिस्क बढ़ा है घटनाएं हो रही है। ऐसी योजनाएं जन उपयोगी हैं। प्रधानमंत्री  फसल बीमा योजना जैसी योजनाओं से लोगों को काफी उम्मीद थी इसमें 17 से 18 कंपनियां काम कर रही हैं। आप आए दिन अखबारों में पढ़ते होंगे कि इस कंपनी ने किसानों से इतना मुआवजा लिया लेकिन दिया नहीं। मैं आपको पिछले साल बुंदेलखंड के, झांसी के आसपास के दो गांवो के उदाहरण देता हूं जहां बीमा कंपनियों को  लगभग 50 से 60 लख रुपए का प्रीमियम गया था। जब कंपनी ने किसानों के नुकसान का भुगतान नहीं किया तो किस कोर्ट पहुंच गए थे। जबकि वहां कंपनी वाले कम रकबा वाली फसल तिल का भुगतान कर रहे थे और उड़द की फसल का भुगतान नहीं कर रहे थे। किसानों का मानना है की फसल बीमा योजना अच्छी है, वे प्रीमियम भी देना चाहते हैं लेकिन जब उनकी फसल का नुकसान होता है तो कंपनियां उन्हें मुआवजा नहीं देती हैं। बीमा कंपनियों से मुआवजा लेने के लिए भारत में कई आंदोलन भी हुए हैं। मेरा भी जमाना है कि अगर किसान ने फसल का बीमा करवाया है प्रीमियम भरा है तो जब किसान का नुकसान हो तो उसे मुआवजा मिलना चाहिए। लेकिन मुआवजा मिल नहीं रहा है। महाराष्ट्र में फसल बीमा 1 रुपए में होता था लेकिन अब सरकार ने वह भी बंद कर दिया। जैसे-जैसे किसानों का जोखिम बढ़ रहा है वैसे ही किसानों के दिए एक मेकैनिज्म तैयार करना चाहिए था लेकिन हमारे यहां ऐसा हो नहीं पाया।

सौरभ शर्मा: क्या हमारी पारंपरिक पद्धतियां किसानों के काम आ रही हैं?

अरविंद शुक्ला: मैं इस प्रश्न का उत्तर दो भागों में दूंगा। हमारे यहां अकाल का इतिहास रहा है। कभी ना कभी अधिक गर्मी और अधिक सर्दी पड़ी होगी। पहले जो सबसे मजबूत और टिकाऊ चीज होती थी, वह हमारे थे परंपरागत ज्ञान और बीज। ढाई फीट पानी में धान खड़े रहते थे। चाहे कितना भी कुछ हो जाए लेकिन किसी खाने भर का पैदा कर लेता था। 2 साल पहले अभी जब असम में बाढ़ आई थी तो वहां की सरकार ने किसानों को एक विशेष किस्म बोरोटेन नामक धान दिया था और किसानों को प्रेरित कर रही थी कि आप सभी लोग अपने खेतों में इस धान की किस्म को लगाएं। इस धान की खास बात ये थी कि ये ढाई फीट पानी में भी खाने भर के दाने दे देता। हमारे यहां कटिया और खबली जैसी गेहूं की कई किस्में रही जिन पर मौसम का असर नहीं पड़ता था। झारखंड में लगातार सूखे जैसी स्थितियां उत्पन्न होती रहती हैं। वहां लोग धान और गेहूं नहीं उगाते हैं। वहां के लोग मडुवा उगाते हैं। झारखंड में मड़वा की खेती पर फिर से जोर दिया जा रहा है।

सौरभ शर्मा: भारत में ऐसे कितने किसान हैं जो पारंपरिक रूप से जलवायु परिवर्तन जैसी समस्या से लड़ सकते हैं?


अरविंद शुक्ला: इनकी संख्या न्यूनतम है। मैं कुछ दिन पहले झारखंड में था वहां मैं एक महिला किस से पूछा कि आप लोग कौन सा धान उगाती हैं। तो उन्होंने बोला कि अब हम लोग हाइब्रिड धान उगाते हैं। पारंपरिक धान अब यहां नहीं उगाते क्योंकि उसकी पैदावार बहुत कम थी। किसान हाइब्रिड चीज क्यों ना उगाए? क्या हमारे यहां कोई ऐसी चीज है जिससे हम किस को यह गारंटी दे पाए कि आप पारंपरिक खेती करिए अगर नुकसान होगा तो उसकी भरपाई हम करेंगे। किसान यही सोचता है कि हम वह बीच क्यों बॉय जिसमें हमारी पैदावार कम हो।

सौरभ शर्मा: हमारा ध्यान हाइब्रिड बीजों की तरफ़ अधिक जा रहा है। हाइब्रिड बीज जमीन से अधिक मात्रा में न्यूट्रिएंट्स खींचते हैं। क्या जलवायु परिवर्तन की वजह से जमीन की गुणवत्ता भी खराब हो रही है?

अरविंद शुक्ला: सिर्फ खराब करना जमीन के साथ नाइंसाफी होगी क्योंकि हम इसे काफी ज्यादा खराब कर चुके हैं। उपजाऊ जमीन कुछ दिनों में बंजर हो जाएगी। पहले हम खेत में सीजन 10 सीजन फसल चक्र के हिसाब से खेती करते थे कभी उसमें गेहूं लगाते कभी धन कभी उड़द ऐसे में फसल का चक्कर चलता रहता था। लेकिन मोनोक्रोपी हो रही है। पश्चिमी यूपी जाओगे तो सिर्फ गन्ना ही गन्ना दिखेगा, पंजाब हरियाणा जाओगे तो गेहूं और सरसों दिखाई देगा। मोनोक्रोपी से जमीन में न्यूट्रिएंट्स की कमी हो गई और अब  खेती एनपीके  आधारित हो गई है। किसान अब गोबर और हरी का आधारित खेती से दूर जा रहे हैं। किसान खेत से साल में चार फसले ले रहा है। इससे जमीन की उत्पादकता कम हो रही है, इसके साथ ही जमीन भी खोखली होती जा रही है। अगर किसी किसान ने अपनी फसल में सिर्फ डीएपी डाली और बाकी पोषक तत्व नहीं डालें तो उसे डीएपी का फसल पर कोई भी असर नहीं होगा। फर्टिलाइजर से मिट्टी को काफी नुकसान हो रहा है।

सौरभ शर्मा: खराब होती मिट्टी की गुणवत्ता के लिए सरकार क्या कर रही है? आने वाले एक दो दशक कृषि के संदर्भ में कितने चुनौती पूर्ण होंगे?


अरविंद शुक्ला: जब ये नई सरकार आई तो सॉइल हेल्थ प्रोग्राम शुरू किया। तो हम लोगों को लगा था ये बहुत अच्छा कदम है। ये बहुत अच्छी स्कीम थी। अगर आप किसी गांव में जाकर लोगों से पूछेंगे तो वो बताएंगे कि सबकी रिपोर्ट एक जैसी है।अब इस सेक्टर में बहुत सी प्राइवेट कम्पनियां आ गई हैं कुछ पैसे लेकर काम करेगी कुछ पैसे नहीं लेंगी। जिले स्तर पर मिट्टी की जांच के लिए लैब खोली गई हैं जहां पर 12 रुपए से लेकर 29 रुपए में मिट्टी की जांच कराई जा सकती है। लैब में मिट्टी की कई प्रकार की जांचे होती हैं। उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले की लैब के बारे में हमने लिखा था तो हमारे पास लगभग 50 सवाल हमारे पास आए थे कि मैं जांच कहां कराऊं हमारी मिट्टी जांच करवा दो। मिट्टी भेज दूं जांच करवा दो। इसका मतलब यह है जो सरकार कह रही है कि मिट्टी के इतने नमूनों की जाँच हुई है तो इतने सवाल कैसे आ रहे हैं।

सौरभ शर्मा: आने वाला दशक कृषि के संदर्भ में कैसा रहेगा और क्या खाद्य सुरक्षा पर कोई प्रभाव पड़ेगा?


अरविंद शुक्ला: खेती जोखिम का सौदा माना जाता है क्योंकि किसान खुले आसमान के नीचे अपनी फसल डालता है और वह जोखिम लेने का बहुत आदी है। किस को दुनिया का सबसे बड़ा एंटरप्रेन्योर माना जाता है जो हर कदम पर जोखिम लेता है। वह अपनी फसल को खुले आसमान के नीचे छोड़ देता है। यह उसकी मजबूरी भी है क्योंकि कोई भी ऐसी छत अभी तक नहीं बनी है जो उसकी फसल को ढक सके। जलवायु परिवर्तन की समस्याओं के चलते किसान का जोखिम बहुत अधिक बढ़ गया है। पहले किस को या पता रहता था कि फरवरी में कैसा मौसम रहेगा लेकिन अब ऐसा नहीं होता फरवरी में क्या होगा किसी को नहीं पता। पहले चार-पांच साल में एक बार सूखा पड़ता था तो किसने पर इसका बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता था। बारिश ज्यादा हो जाती थी तो उन्हें लगता था कि हथिया बरस गई उसके बाद अधिक बारिश नहीं होगी। पहले हमारे बाबा दादा यही कहते थे कि खिचड़ी के स्नान तक ठंडी रहेगी या मौनी अमावस्या तक ठंडी उसके बाद मौसम चढ़ने लगेगा। क्योंकि उन्हें पता रहता था कि कालचक्र यही है और मौसम ऐसे ही चलता रहेगा। मौसम में उतार चढ़ाव से हमारे फसल पर प्रभाव पड़ेगा। जलवायु परिवर्तन से खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ेगा।

सौरभ शर्मा: क्या आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन की समस्या और गहरी होती चली जाएगी और गंभीर हो सकती है?

अरविंद शुक्ला: जाहिर सी बात है जो हो रहा है। हमको आपको दिखाई भी पड़ रहा है। हम और आप अभी ऐसे हॉफ टीशर्ट और हॉफ स्वेटर पहन कर बैठे हैं यह चरम सर्दियों के दिन है ,पहले इन दोनों ठिठुरने वाली ठंड पड़ती थी। आपने देखा होगा की बुंदेलखंड में बाढ़ आई असम में बाढ़ आई, सऊदी में जहां बालू के टील होते हैं वहां बाढ़ आई। पिछले दो वर्षों में टिड्डियां का अटैक बढ़ गया है। टिड्डियों का अटैक बताता है कि किसान का जोखिम बढ़ रहा है। बाढ़ का जोखिम बढ़ रहा है,  कभी ऐसा भी हो सकता है कि फसल तैयार है बाढ़ आई बहाकर ले गई।

सौरभ शर्मा: किसान और सरकार इस समस्या से निपटने के लिए अपने-अपने छोर पर क्या कर रहे हैं?


अरविंद शुक्ला: मैं यह नहीं कहूंगा कि कुछ हो नहीं रहा है। बहुत सारा काम भी हो रहा है। हमारे यहां खेती बारिश पर निर्भर है। फसल के दौरान बारिश नहीं हो रही है। आज के समय में माइक्रो इरिगेशन बहुत बड़ा टूल है सरकार भी इस पर फोकस कर रही है। अभी सरकार इस पर 90 फ़ीसदी तक सब्सिडी दे रही है। सरकार प्रोटेक्टेड कल्टीवेशन पर भी फोकस कर रही है जैसे कि पॉलीहाउस में खेती आदि। दूसरा सरकार बीज पर बात कर रही है ऐसे बीज विकसित कर रही है जो की बारिश सर्दी गर्मी आदि से लड़ने में थोड़ा सक्षम हो। सरकार ने मोटे अनाज की तरफ भी कदम बढ़ाया है। मेरा मानना है मोनोक्रोपी कम करनी चाहिए ऐसी फसले मत उगाईये। क्योंकि खाना हमें हैं। हम शकरकंदी भी उगा सकते हैं।जिनमें ज्यादा पानी ज्यादा लगता है। अगर आपके यहां ज्वार होता है तो ज्वार उगाओ, मडुवा होता है तो मडुवा उगाएं। अगर इन फसलों का किसान को मार्केट मिल जाए तो वो उगाए भी और इससे उसका जोखिम भी कम होगा।

आपका पॉडकास्ट सुनने के लिए शुक्रिया। अगर आपको पॉडकास्ट पसंद आया तो अपने फेवरेट स्टेशन पर इसे सब्सक्राइब करना ना भूलें। अगले हफ्ते फिर मिलते हैं नए गेस्ट के साथ.

[समाप्त]



[पॉडकास्ट आउटरू ]

अर्थ अनर्थ सुनने के लिए धन्यवाद! इस चैनल को सब्सक्राइब करें ताकि कोई भी अपडेट मिस न हो। हमें फीडबैक देने के लिए हमारी वेबसाइट पर जाएँ या हमें 101 रिपोर्टर्स पर लिखें

हम Twitter पर हैं। आप @saurabhsherry को फॉलो कर सकते हैं


[समाप्त]