आखिर वह बेला आ ही गई, जब अपना देश विश्व की एक विशेष  श्रेणी  मे    शामिल हो गया । आज यह कोई पहली बार नहीं, बल्कि आज से लगभग 5 साल पहले भी एक इतिहास रचा गया था। वह दिन था 24 सितंबर 2014 का।  उस दिन भारत केवल मर्सियन इलीट क्लब में  ही शामिल न  हुआ, बल्कि विश्व का पहला देश बना जिसने अपनी पहली ही बार में मंगल फतहकर गया।  उस दिन पूरे सवा सौ करोड़ भारतीयों का हृदय प्रफुल्लित हो गया था। और अब फिर से भारत देश ने करिश्मे जैसी कामयाबी की नींव  रख दी , और यह दिखा दिया कि हम विश्व बिरादरी में आज सबसे अलग हैं।

        चंद्रमा जो कि पृथ्वी का एकमात्र और सौर प्रणाली का पांचवा सबसे बड़ा उपग्रह है। उसे छूने की नई चाहत एकबार फिर से इकठ्ठा हो रही है । पहली बार यह चाहत  आज  से पूरे 50 बरस पहली भी हुई  थी। जो पहली बार इंसानी पहुंच के बाद खत्म हुई।

       आज इस ऐतिहासिक क्षण में,  हमें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक श्री विक्रम अंबालाल साराभाई जी की याद आ रही है। जिन्होंने अपने देश में अंतरिक्ष कार्यक्रम का एक छोटा सा पौधा रोपा था ।  जो आज वृक्ष बन कर खड़ा है । जरा स्मरण कीजिए कि जब उन्होंने ऐसे प्रयास शुरु किए थे। तब बहुत सारी  आपत्तियां जताई गई थी। लेकिन भारत की गरिमा को जीवित रखने के लिए डॉक्टर सी. वी. रमन और डॉक्टर प्रफुल्ल राय के मार्ग का अनुसरण किया। जिसका फल ही तो है जो भारत अंतरिक्ष की दुनिया में एक बहुत बड़ी महाशक्ति है।

    अब यह  एक संयोग मात्र ही है कि इसी महीने 20 जुलाई को चंद्रमा पर मानव मिशन की 50 साल भी पूरे हो रहे हैं । आज के  50 साल पहले, जब अमेरिकी अंतरिक्ष वैज्ञानिक नील आर्मस्ट्रांग  और  एडविन एलड्रिन के  चरण पहली बार चांद पर पड़े थे । तब शायद ही यह कल्पना मात्र ही थी कि चांद पर पहुंचने की  होड़ होगी।  उस समय किसी ने भी यह तक नहीं सोचा होगा कि सुदूर अंतरिक्ष में घर बनाकर बसावट भी हो सकती है।

       अभी लगभग दो-तीन साल पहले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान isro ने चंद्रयान2  को भेजने की घोषणा की थी।  यह चंद्रयान2,  15 जुलाई को चांद पर जाने के लिए तैयार था। पर चंद्रयान  अपनी यात्रा शुरू करने से  मात्र घंटा पहले ही किसी गड़बड़ी का शिकार हो गया।  जिस कारण मिशन कुछ दिनों के लिए  डाल दिया गया।

       यह दोबारा इतिहास बनाने वाली बात होगी। जब चंद्रयान 2 के सफल प्रक्षेपण के साथ भारत यह उपलब्ध पाने वाला  चौथा  राष्ट्र बन जाएगा।  अभी तक अमेरिका, रूस और चीन ही इस मुकाम को हासिल कर पाए हैं।  अब यह फिर से सवा सौ करोड़ भारतीयों के लिए गर्व की बात होगी।

   अपने पहले ही प्रयास में मंगल फतह करने  के बाद चंद्रयान 2 की  सफलता इतिहास में स्वर्णिम  अच्छरों से लिखी जाएगी।  वैज्ञानिक जगत के साथ-साथ पूरे विश्व के लिए वह दिन बहुत ही गौरव भरने वाला होगा।   पिछले दशक के देश के सबसे सफल अंतरिक्ष अभियान चंद्रयान एक और मंगल मिशन के बाद इतिहास के पन्नों में इस दशक की सबसे बड़ी कामयाबी में इस अभियान को शुमार किया जाएगा।

         चांद मानव  के लिए सदैव जिज्ञासा का विषय रहा है।  दुनिया में चंद्रमा को और नजदीक से जानने, समझने और देखने की रेस सन 1965 से शुरू हुई थी। उस समय अमेरिका ने ' जेमिनी श्रृंखला'  के यान को चंद्र अध्ययन के लिए भेजना शुरू कर दिया था।  इन अभियानों का उद्देश्य चंद्रमा के लिए अपोलो मिशन की तैयारी करना था।

         चांद पर अब मानव बस्ती बसाने , उसकी उत्पत्ति,  जलीय प्रक्रम की संभावनाओं एवं अन्यान्य  वैज्ञानिक रहस्यों  पर से पर्दा हटाने  के निमित चंद्र अभियान का क्रम सतत रुप से जारी है।  भारत भी  इस क्षेत्र में लगातार अपनी पैठ मजबूत कर रहा है । भारत का अंतरिक्ष युग में प्रवेश 19 अप्रैल 1975 को तब हुआ।  जब 'सोवियत कॉस्मोड्रोम' से  रॉकेट 'इंटर कॉसमॉस' के माध्यम से पूर्णतया स्वदेशी तकनीकी से निर्मित प्रथम उपग्रह 'आर्यभट्ट' सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया था।  लेकिन इसकी आधारभूति  तैयार करने में लगभग 27 साल का समय लग गया था।

       भारत में पहली बार चंद्र मिशन की नींव 22 अक्टूबर 2008 को पड़ी  थी । आज इस चंद्र मिशन के शुरू हुए 11 साल पूरे ही गये हैं। इस मिशन (चन्द्रयान1) की सफलता ने भारत का लोहा पूरी दुनिया में मनवा दिया था।  इस चंद्रयान 1  ने चांद पर पानी से लेकर चंद्र कम्प  के बारे में बताया था।  यह चांद पर बसने की ओर बहुत बड़ा कदम है।

       चंद्रयान1  के साथ   मून मिमनरोलॉजी मैपर ( m3)  से प्राप्त आंकड़ों का नासा ने विश्लेषण किया। जिसमें चांद पर पानी होने के ठोस  सबूत मिले हैं । m3 के आंकड़ों के प्रमुख इन्वेस्टीगेशन अमेरिकी वैज्ञानिक  कार्ला  पीटरसन ने  साइंस पत्रिका में 24 सितंबर 2009 को प्रकाशित पेपर में इसकी पुष्टि की। ठीक  ऐसी  ही कई सारी खोजो का श्रेय चंद्रयान एक  को जाता है । इसी चंद्र मिशन की अगली कड़ी का चंद्रयान 2 चांद पर न सिर्फ  बस्ती बसाने में सहायक होगा बल्कि चांद की रहस्य से भी पर्दा हटाएगा।

 पिछले  कुछ वर्षों में,  एक बार फिर चांद पर पहुंचने की होड़ शुरू हो गयी है।  इसके पीछे अति महंगा हीलियम 3 है । यह हीलियम 3ही भविष्य का इंधन है। हीलियम 3 हीलियम  का ही एक  समस्थानिक है।  जिसमें दो प्रोटॉन और एक न्यूट्रॉन  होता है। हीलियम 3 चाँद की रिंगोलिथ (भूमि) की  ऊपरी सतह में पाया जाता है। जो अरबों बरसो से चल रही सौर पवन की देन है। रिंगोलिथ के 28 पीपीएम में 0.01पीपीएम हीलियम 3 होता है। हीलियम 3 को द्वितीय पीढ़ी का ईंधन माना जाता है।

   जैसा की मुझे आशा है कि चंद्रयान 2 चाँद पर इस बहुमूल्य हीलियम3 जे बारे में भी खोज करेगा। अगर यह बात सही निकली तो जल्द ही भारत हीलियम चालित यान के बारे में भी शोध शुरू कर देगा। इस हीलियम3 से ही हम बड़ी मात्रा में परमाणु ऊर्जा भी बना सकते हैं। हीलियम 3 की खोज में इस समय ज्यादा खर्च भी आ सकता है, क्योंकि इस समय चाँद पर एक मिनट रहने का खर्च लगभग ₹5 करोड़ है। इसलिए इस समय हीलियम3 की खोज बहुत ही खर्चीली भी होगी।

    चंद्रयान2, चंद्रयान1 से कहीं ज्यादा विकसित है। इसका लक्ष्य ऑर्बिटल के साथ साथ चंद्रमा की सतह पर पहुचना और उसकी सतह पर रोवर चलाने का है। इस मिशन के बाद भारत  चाँद पर उतरने वाले चौथे और चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचने वाले पहला देश बन जायेगा। इस चंद्रयान2 की उड़ान के साथ भारत देश की सवा सौ करोड़ भारतीयों की जिज्ञासाएं और कौतुहल भी उड़ान भरकर जाने वालीं हैं। जो एक बहुत ही बड़ी उपलब्धि के रूप में बनकर ही रहेगी। बस इतने से ही सब ना होगा।  मुझे लगता है कि अभी और भी शोध किये जाने की जरूरत है। इसके लिए वहां पर (चांद पर) एक अंतरिक्ष स्टेशन बनाया जाये।  अंतरिक्ष कार्यक्रम के बेहतर संचालन के लिए अंतरिक्ष स्टेशन की स्थापना बहुत जरुरी है।  मगर यह तभी फायदेमंद होगा। जब अंतरिक्ष स्टेशन में ही उपग्रहों का निर्माण हो और वहीँ से ही दूसरे ग्रहों के लिए भेजा जाए।  इससे अंतरिक्ष कार्यक्रम में होने वाले खर्च में कमी तो आएगी, साथ ही अंतरिक्ष कार्यक्रम में लगने वाले समय की बचत भी होगी।

       चंद्रयान दो लांच करने में भले ही  कुछ देरी हो रही हो, लेकिन यह परियोजना भारत के लिए अपनी क्षमता  के प्रदर्शन और नई खोज को लेकर बेहद हम साबित होगी।  20 से 25 जुलाई के बीच प्रक्षेपित होने वाले चंद्रयान दो की सफलता भारत के लिए आगे के रास्ते भी खोलेगी।  यदि चंद्रयान1 और चंद्रयान2 में फर्क देखें तो चंद्रयान1 ने  चांद से सौ किलो मीटर ऊपर रहते हुए चांद का विश्लेषण किया था, जबकि चंद्रयान2 चाँद पर उतरकर अध्ययन  करेगा। अब उसी किस्म के अच्छे और अत्याधुनिक 13 उपकरण चंद्रयान2 में हैं। चंद्रयान2 चाँद पर उतरने तक ही सीमित है पर हो सकता है कि चंद्रयान 3 में चाँद पर उतर कर वापस लौटने की क्षमता भी भारत विकसित कर ले।

  "इस ऐतिहासिक अवसर पर इसरो के तपोनिष्ठ इंजीनियरों और वैज्ञानिकों को हमारा नमन"

पंकज शर्मा

(युवा वैज्ञानिक और शोधकर्ता)

(कॉस्मोससिटी के व्यवस्थापक)

कॉस्मोससिटी सुदूर अंतरिक्ष में मानव बस्तियां बसाने पर शोध कर रही है।